
झारखण्ड राज्य के सबसे नवीनतम जिले की जब बात आती है है तो खूंटी का नाम सबसे ऊपर दिखाई देता है। राज्य की राजधानी से महज 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस शहर का काफी आद्वितीय, दार्शनिक एवं प्राकृतिक सौंदर्य स्थल है। इस आदिवासी बहुल क्षेत्र में रोज़गार के लिए ज्यादातर लोग खरीफ मौसम की खेती पर आश्रित हैं। खरीफ के मौसम में भी उच्च मूल्य कृषि (कैश क्रॉप) की जगह धान जैसी फसलों पर अपना ध्यान केन्द्रित रखते हैं। जागरूकता के अभाव में यहाँ के लोग आजीविका के नए, वैकल्पिक एवं तकनिकी संसाधनों से वंचित रह जाते हैं। यदि कुछ परिवार बकरीपालन, मुर्गीपालन करते भी हैं तो वह पारंपरिक तरीके और प्रजातियों तक ही सीमित हो कर रह जाते हैं। ऐसी स्थिति में घर की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ग्रामीण पलायन को सहारा मान बैठते हैं एवं वर्ष का अधिकतर समय गाँव-घर से दूर शहर में दिहारी-मजदूरी या अन्य काम कर अपने जीविकोपार्जन किसी तरह निर्वाहन करने का प्रयास करते हैं।
किसी भी उपलब्धि को प्राप्त करने के लिए तीन चीजें बहुत ही महत्वपूर्ण होती हैं, दृष्टि, मेहनत और निरंतरता। समेकित आजीविका कृषि पार्क, लोयोंगकेल, कर्रा आज इन्हीं तीन पहलुओं का आधार है। वर्ष 2020 तक यह पार्क महज़ एक भूमि का टुकड़ा था जिसके कुल 23 एकड़ के भू-भाग में से करीबन 10 एकड़ भूमि पर धान के लिए बीज उत्पादन का कार्य किया जाता था। कृषि विभाग के द्वारा इसे बीज गुणन परक्षेत्र के रूप में पहचान मिली हुई थी। मूलतः इसका इस्तमाल खरीफ की खेती के लिए किया जाता था। खरीफ फसलों की कटाई के समय यहाँ स्थित चबूतरे को खलिहान के माफिक इस्तमाल किया जाता था। रबी और ज़ैद के मौसम में यह प्रांगन मवेशियों के लिए महज़ एक चारागाह का केंद्र बन कर रह जाता था।
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ज़िले के ग्रामीण मुख्यतः खरीफ की खेती, कुछ प्रजातियों तक सीमित पशुपालन पर अपने जजीविकोपार्जन के लिए आश्रित रहते हैं। खरीफ के बाद अपने जीविकोपार्जन के लिए यहाँ के लोग दिहाड़ी मजदूरी पर आश्रित रहते हैं। कई लोग अपने घर को चलाने के लिए पलायन भी करने लगते हैं। ऐसे में सखी मंडलों और उनके परिजनों पर जीविका की ज़िम्मेदारी बढ़ने लगती है। इस समस्या के सतत हल के उद्देश्य से समेकित आजीविका कृषि पार्क को बढ़ावा दिया जा रहा है। उपलब्ध जमीन के सही उपयोग को मद्देनजर रखते हुए कार्ययोजना बनाने के क्रम से ड्रेन टेक्नोलॉजी एवं विकसित प्रणाली को समायोजित किया गया है। जिसके मुख्य घटक निम्नवत हैं-
आजीविका फार्म के अंतर्गत कृषि पाठशाला के माध्यम से आजीविका के वैकल्पिक संसाधनों को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह पहल आमजनों को ऐसे वैकल्पिक संसाधनों से अवगत कराने और इन संसाधनों को उनके निजी जीवन का हिस्सा बनाने की है।
आजीविका के नए उपाय जैसे उच्च मूल्य कृषि, सब्जी एवं फलों की खेती, मुर्गीपालन, मछली-सह-बत्तख्पालन, मधुमक्खीपालन-सह-शहद उत्पादन आदि शामिल हैं।
फार्म को बेहतर संसाधन केंद्र बनाने के उद्देश्य से विभिन्न विभागों के साथ समन्वय स्थापित कर अभिसरण के माध्यम से भी कार्यों का निष्पादन किया जा रहा है।
खेत समुदाय के सभी आस-पास के किसानों के लिए कृषि संबंधी सभी गतिविधियों के लिए एक संसाधन प्रकोष्ठ और प्रदर्शन पार्क के रूप में कार्य करेगा। कर्रा आजीविका फार्म-सह-किसान पाठशाला उत्पादक समहू नाम से एक किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) का गठन किया गया है। वर्तमान में इसके 100 सदस्य हैं और भविष्य में लगभग 500 किसानों को जोड़ने का लक्ष्य है।
एकीकृत फार्म मॉडल सुलभ और सस्ती उच्च मूल्य वाली फसल के पौधे और अन्य उत्पाद जैसे बीज रहित नीम्बू, कम लागत वाली मशरूम की किस्म और खेती के तरीके, मुर्रा भैंस बछड़ा आदि प्रदान करेगा।
हमारा विज़न सरल लेकिन शक्तिशाली है: हम एक ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं जहाँ टिकाऊ खेती सिर्फ़ एक विकल्प न हो, बल्कि जीने का एक तरीका हो। इनोवेशन, शिक्षा और समुदाय के ज़रिए, Organic खेती को हर किसी के लिए सुलभ बनाने का प्रयास करता है — लोगों को घर पर ही भोजन उगाने, अपने शरीर को पोषण देने और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरा-भरा ग्रह बनाने में मदद करता है।
हमारा विज़न साहसी लेकिन स्पष्ट है: इनोवेशन, डिज़ाइन और समुदाय के ज़रिए लोगों को प्रकृति और भोजन से फिर से जोड़ना। हम एक ऐसी दुनिया देखते हैं जहाँ साफ़-सुथरा भोजन घर के पास ही उगाया जाता है, जहाँ लोगों को पौधे लगाने में शांति और उद्देश्य मिलता है, और जहाँ स्थिरता सिर्फ़ एक ट्रेंड नहीं — बल्कि जीने का एक तरीका है।