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पशुपालन

कृषक पाठशाला में, हमारी सेवाएँ आपको नैतिक खेती और शुद्ध, सीधे खेत से आए ताज़े उत्पादों
के माध्यम से प्रकृति के और करीब लाने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।.

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झारखण्ड राज्य में कृषि के साथ बागवानी की भी अच्छी गुंजाइश है। यहाँ के जंगल, करंज, जामुन, नीम, सखुआ, सागवान, शीशम, सेमल, युक्लिष्टस, इमली, बकाईन आदि वृक्षों से भरे हुए है। जिससे शहद का उत्पादन आधिक होता है। इस तरह हम देखते है कि झारखण्ड राज्य मधुमक्खी पालन के लिए अत्यंत ही उपयुक्त है।

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गाय पालन को बढ़ावा देने और उनसे बेहतर उत्पाद के लिए गीर प्रजाति के गायों को बढ़ावा दिया जा रहा है। गीर प्रजाति के 20 गायों से इसकी शुरुआत की गयी है। अब इन गायों की संख्या बढ़कर 28 हो गयी है।

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जल संसाधन के श्रोतों में समेकित बत्तख-सह-मछलीपालन को बढ़ावा देने के लिए इंडियन रनर और खाकी कैंपवेल प्रजाति के बत्तख और रेहू, कतला, मृगल के साथ-साथ जॉइंट तेलापिया प्रकार की मछली को संपोषित किया जा रहा है। इस पहल से एक जल श्रोत से दो से तीन प्रकार के जीविकोपार्जन उपलब्ध हो पाएंगे। इसके अतिरिक्त बत्तख के चूजों के लिए भी हैचरी इकाई की स्थापना की जा चुकी है।

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किसानों के आर्थिक विकास में पशुधन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आदिवासी क्षेत्रों में किसान मिश्रित कृषि प्रणाली यानी फसल और पशुधन का संयोजन बनाए रखते हैं, जहां एक उद्यम का उत्पादन दूसरे उद्यम का इनपुट बन जाता है, जिससे संसाधन दक्षता का एहसास होता है।

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खूंटी में सफेद चिकन (ब्रॉयलर) और देशी किस्म के चिकन आमतौर पर पाए जाते हैं। ब्रॉयलर किस्मों की प्रजातियों की देखभाल में अधिक समय लगता है और यह रोग प्रवृत भी होते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए मुर्गीपालन के लिए सोनाली प्रजाति को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह अंडा और मांस उत्पादन, तेजी से विकास और कम मृत्यु दर गहन कृषि प्रणाली के संबंध में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए सूचित किया गया है।

चूजों को एक हज़ार से दो हज़ार के बैच में 15 दिनों तक के लिए हार्डनिंग केंद्र में रखा जाता है ताकि चूजों को बीमारी से बचाते हुए रोग मुक्त बनाया जा सके।

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